कल्पनापूरा संग्रह

रचना 187 / 789

तुमने फिर फिर डाली रेत मुझ पर

तुमने फिर फिर डाली रेत मुझ पर.... मैं पिघलती रही पहाड़ों पर प्रेम पाटने से पहाड़ कहां बनते हैं ... थार बनता है।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह