कल्पनापूरा संग्रह

रचना 255 / 789

कुछ रंग खुरचकर भी निकलते

कुछ रंग खुरचकर भी निकलते... तुम मेरा वही प्रीत रंग हो। बस लग गए हो।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह