कल्पनापूरा संग्रह

रचना 262 / 789

उसकी हथेली में विश्वास था, मान था, तसल्ली थी

उसकी हथेली में विश्वास था, मान था, तसल्ली थी मेरी हथेली में आस थी ,मन था, प्रतिक्षा थी हम दोनों कितने पास पास थे पर हमारी हथेलियां टकराना,छूना भूल चुकी थी।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह