कल्पनापूरा संग्रह

रचना 267 / 789

एक रोज़ बागी होना चाहूँगी

*एक रोज़ बागी होना चाहूँगी.... मैंने कल्पना के कानों में मुस्कुराते हुए कहा.....तुम देखना😊😊😊 *ज़िन्दगी की बेदर्दी लिखो तो कागज़ वाह - वाह करने लगता है। *तन और मन दो अलग किस्म के प्रेमी हैं । एक ज़िद्द है एक ज़िद्दी *दो चुप लोगों के बीच प्रेम बोलता है। *मैं लोगों के साथ अकेली हो जाती हूँ ... और तुम्हारे साथ पूरा शहर ये दोष प्रेम का है। *मेरे पास अनगिनत दिल हैं... सबके लिए बस मन एक है। वो तुम्हारा रहेगा *अभी मां के घर हूं....मिलते हैं कल पहाड़ों से

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह