कल्पनापूरा संग्रह

रचना 332 / 789

प्रेम अणु है .... टूट टूट कर भी प्रेम ही रहता है।

प्रेम अणु है .... टूट टूट कर भी प्रेम ही रहता है।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह