कल्पनापूरा संग्रह

रचना 389 / 789

थकान

थकान..... *सुनने का मन बनाओ तो कहूँगी। मैं थक गई हूं ....बनते बिगड़ते *अक्सर थक जाती हूँ तुम्हें ढूंढते हुए तुम मिल जाते हो फिर किसी और पते पर किसी और के कागज़ पर काला जादू बिखेरते हुए। क्या करूँ.... हंस देती हूं। मैं फ़िर भर जाती हूँ उस प्रेम से जो कम पड़ गया इस दफ़े और पिछली दफ़े भी *मेरी थकान प्रेम में सूखे फूलों सी है। असीम अज़ीज़ अथक अंतिम *मैं थक गई तो कौन पूछेगा- तुम कैसे हो? *तुम मुझे अब नकार नहीं सकतेl तुम उग आए हो मुझमें ...कंटीली घास की तरह। मुझे ये वाली थकान ही चाहिए। *राहत आसान थी पर मैंने उस मन का प्रेम चुना जो मेरे लिए मूक था। राह नहीं . मुझे राही पसंद था । कभी सोचना....मैं कितना थक जाती हूँ तुम्हारे प्रेम में पड़ कर। 😊😊😊 *तस्वीर २००७ की है। उम्र से बस एक शिकायत है ....हम अपनी मासूमियत पर कील ठोक कर रख नहीं पाते। वो ठोस हो जाती है... चेहरे पर

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह