कल्पनापूरा संग्रह

रचना 591 / 789

कब तक फिसलते रहोगे

कब तक फिसलते रहोगे इस शाम की तरह ? कब तक चलते रहोगे इस चाँद की तरह? लाओ अपने शब्दों का लंगर डाल देती हूँ । तुम्हें डायरी में रोक देती हूँ । एक ताज़ा विराम रच देती हूं।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह