कल्पनापूरा संग्रह

रचना 695 / 789

तेरे हाल में अपना हाल मिलाया जाए

तेरे हाल में अपना हाल मिलाया जाए बात बात में एक समंदर गलाया जाए। हम भी हैं क्या और तुम भी कौन हो? हर मसला वक्त रहते सुलझाया जाए । तस्वीर में हंसी बदन से रूठी है शायद कूची को जरा चूमकर उकसाया जाए l इक पल में ही कर लूंगी हजार सौ बातें चुप्पी को ज़रा उधर को सरकाया जाए l अरसे से आया नहीं कोई बसंत पतझर जिंदगी का नुक्ता खुद ही मिटाया जाए l

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह