कल्पनापूरा संग्रह

रचना 93 / 789

हमारी देख उतनी नहीं होती जितनी पुतलियों की जद में आएं बल्कि…

हमारी देख उतनी नहीं होती जितनी पुतलियों की जद में आएं बल्कि उतनी होती है जितनी कि कल्पना की हद में आए। तुमको कविता में जगह दी है। बस तुमको।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह