कल्पनापूरा संग्रह

रचना 96 / 789

प्रेम को प्रेम नहीं उसकी नम्रता सींचती है।

प्रेम को प्रेम नहीं उसकी नम्रता सींचती है। पीड़ को पीर कभी न कहना।

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