कल्पनापूरा संग्रह

रचना 102 / 789

वक़्त का नुक्ता है

वक़्त का नुक्ता है.... कभी ज़द कभी ज़िद पर चिपका रहता है। बस ज़िंदगी हाथ नहीं आती।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह