ऐसा नहीं है कि अब दुखती नहीं हूं ... दर्द अब भी होता है पर…
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ऐसा नहीं है कि अब दुखती नहीं हूं ... दर्द अब भी होता है पर उस रोज़ के बाद मेरे दुःख की आवाज़ ही नहीं आत्मा भी छिल गई। उसका गला बैठ गया ।वो सुन्न पड़ गया। अब मेरे कम दुखने और मंद मंद मुस्कुराते रहने का श्रेय तुमको देती हूं। तुमने अपार दिखा दिया मुझे तो अब अति का पता नहीं चलता। मैं दुःख चुकी ... तुम्हारे हिस्से का अब अपने हिस्से का देख रही.... दुःख चुपचाप कभी तुमको आते जाते हुए । कभी तुमको दुखते दुखाते हुए। मैं चुभती रहूं.... यही प्रार्थना तुम गड़े रहो मुझमें मैं रिसती रहूं तुम में दुःख लिखता रहे प्रेम मेरा तुम्हारा
मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह