कल्पनापूरा संग्रह

रचना 105 / 789

मैं तुमसे बोलता नहीं

मैं तुमसे बोलता नहीं मिलता नहीं दिखता नहीं सुनता नहीं हूँ भी कहीं या नहीं ...ये भी पता नहीं क्यूँ आती हो रोज़? क्यूँ पुकारती हो? मैं कौन हूँ ? उसने मुझसे पूछा। ईश्वर के बाद वाला ईश्वर ... मैंने उससे कहा *खुद से तो रोज़ ही कहती हूँ। तुमसे आज कहा।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह