कल्पनापूरा संग्रह

रचना 115 / 789

एक प्रेम ही है जो थकान और ऊब से परे है ।ऐसा पारस जो आपके…

एक प्रेम ही है जो थकान और ऊब से परे है ।ऐसा पारस जो आपके बोझिल यथार्थ को भी छू दे तो आप महक उठें। धरती की धुरी है प्रेम । यथार्थ उसकी परिक्रमा में रहने वाली कक्षा का अंश भर।

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