मैं शायद तुम्हारे प्रेम में पड़ जाऊं...ये खुद से कहकर लड़के न…
मैं शायद तुम्हारे प्रेम में पड़ जाऊं...ये खुद से कहकर लड़के ने पहली मुलाक़ात में लड़की को एक मुस्कान और कुछ पन्ने दिये। साल भर लड़की उस मुस्कान को पढ़ती रही...उन पन्नों से रोज़ कुछ कहती रही। लड़की ने उसकी दी हुई मुस्कान में अपने ख़्वाब भर दिए ।वो अक्सर पहली मुलाकात वाले पन्नों पर अपने नाम का पहला अक्षर काढ़ देती। साल भर में वो न जाने कितनी बार उन पन्नों में स्याही की तरह रिस गयी। दूसरी मुलाकात में लड़की ने मुस्कान वापिस की तो लड़के ने उसे अपनी जेब में धर लिया और साल भर पुराने उन पन्नो से एक पन्ना मोड़ कर एक अधूरा वाक्य लिखकर लौटा दिया। साल भर लड़की उस अधूरे वाक्य को चूम कर पूरा करती रही। तीसरी मुलाक़ात पर लड़के ने दिल के आकार का पत्थर का टुकड़ा और एक मोरपंख दिया.... लड़की मुस्कुराई और कहा ये तो जादुई है। मैं प्यास और आस दोनों क़ुबूल करती हूँ। साल भर पथरीले दिल को उसने अपने दिल के साथ लपेट कर खुद में बांधे रखा ।जब भी उसके इंतज़ार में निराश होती तो मोरपंखी हो जाती। चौथी मुलाकात में लड़की को उँगलियों का स्पर्श मिला और एक उम्मीद । शायद दो बँधे दिल साथ धड़कने की राह ढूंढ रहे थे। लड़की ने लड़के को कुछ पल के लिए अपने स्पर्श से ढँक कर मोरपंखी कर दिया। पांचवीं मुलाकात में सही लोग गलत समय पर मिले और सब तितर बितर हो गया। एक मौन ने दूसरे की हंसी छीन ली। पर वे दूर न हो सके। हो ही नहीं सकते। ईश्वर खेल रच रहा। ऐसी कई मुलाकातें अभी और होनी तय है। लड़की समय पर सलवटें बनाती रहती है।लड़का वक़्त पर क्रॉस का निशान लगाता रहता है। एक दूसरे को क्या देकर हैरान करेंगे इसी सोच में दोनों मुस्कुराते रहते हैं। अगली मुलाकात होने तक दोनों को सब्र चूमता रहे।