काश मन की ज़ुबान होती
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काश मन की ज़ुबान होती .... ये इतने मुँह तो तकने न पड़ते। कभी सोचती हूँ कितनी बार हम मन के हिस्से करते होंगे ।मन कितनी बार खरोंच खाने के बाद तरल होता होगा कि उससे कविता लिखी जा सके। प्रेम की उदासी और ज़िन्दगी की उदासी पर कविता के लिए मन कितनी बार निचोड़ना पड़ता होगा। कितनी बार मन चटक कर फ़र्श पर गिरता होगा। मन टूट टूट कर भी क्या रह जाता होगा?मन भर.... मन मन भर मन से लिखी जा सकती है क्या कविता? चूर चूर मन क्या कविता लिखता है ? कविता क्या इतनी सहिष्णु होती है कि तरल का गरल तक सोख ले? शिथिल मन और स्पंदित मन कविता के अर्धबिन्दु हैं या पूर्णविराम? कितना दुखना चाहिए मन कि एक *वाह* कविता बन सके?
मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह