कल्पनापूरा संग्रह

रचना 177 / 789

हां थोड़ी नाराज़ थी

हां थोड़ी नाराज़ थी.... इस लिए नहीं कि तुमने मुझे वो कह दिया जो सोचा न था.... पर इस लिए कि तुमने मुझे जाते हुए देखा । जाने दिया । अब सोचती हूं तो लगता है क्या टूटा ? आवाज आती है जो जुड़ा ही न था। नाराज़गी उसी पल से गुम है। दिल वाले गुब्बारे उंगलियों में बांधती रहती हूं। एक रोज़ फिर तुमको देखूंगी फिर उड़ा दूंगी ... दिल *तुम को कैसे जाने दूं? तुम पर अभी रूह रखनी बाकी है।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह