कल्पनापूरा संग्रह

रचना 195 / 789

एक ही हादसे से रोज़ गुजरती हूं

*एक ही हादसे से रोज़ गुजरती हूं... एक ही असर देर तक रहता है। *बरसों से तुम्हारे पास मेरी मुस्कान की चाबी है .... तुम रोज़ इधर उधर रख कर भूल जाते हो। आज कल हंसती हूं तो लोग पूछते हैं क्या हुआ कल्पना? शक्कर कम है क्या हँसी में? या नमकीन हो गई है मुस्कान। कहो... क्या कहूं?. *कारीगरी तो फासलों की थी ..... मैंने कागज़ पर तो दो ही शब्द लिखे थे... मैं .... तुम..... कहानियाँ बनती गयीं। उम्र सरकती रही। आहिस्ता आहिस्ता।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह