तुम्हारी तरफ झुकते हुए कभी ये नहीं सोचती कि कितना गिर जाऊंग…
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तुम्हारी तरफ झुकते हुए कभी ये नहीं सोचती कि कितना गिर जाऊंगी या क्या पाऊंगी.... या कब तक निबाहूंगी। ये बात मैं रोज़ ईश्वर को कहती हूं और प्रेमी सुनता है । फिर देर तक बुत बना मुस्कुराता है कोई शायद दूर और भी कोई।
मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह