कल्पनापूरा संग्रह

रचना 214 / 789

काँच की बोतल में बसे जिन्न की तरह है प्रेम

काँच की बोतल में बसे जिन्न की तरह है प्रेम दिखता भी रहे और बाहर भी न आये। *जब भी ख्वाबों को खंगाला है मैंने एक फारूख सा प्रेमी और एक दीप्ति सी हँसी मिली। आसान.... दो बेहद आसान लोग मेरे ज़ेहन में बसे रहे।

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