कल्पनापूरा संग्रह

रचना 219 / 789

मुट्ठी भर आकाश नहीं पूरा आसमान लूँ

मुट्ठी भर आकाश नहीं पूरा आसमान लूँ सूरज से उसकी उजाले वाली दूकान लूँ रात लिखा करूँ तारों पर अपनी दास्ताँ इसलिए चाँद से वो खाली सा मकान लूँ तस्वीर और शब्द दोनों पुराने हैं... बस मैं नई हूँ।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह