कल्पनापूरा संग्रह

रचना 226 / 789

मैंने प्रेम से बहुत पहले प्रार्थना सीखी

मैंने प्रेम से बहुत पहले प्रार्थना सीखी फिर जाना कि हर प्रार्थना में तुम्हारा होना ही प्रेम है। अब ये मानती हूं कि तुम प्रार्थना हो और मैं प्रेम ईश्वर हमें मिलाकर ही ईश्वर रह पाएगा। उसको प्रेम और प्रार्थना का प्रति उत्तर देना ही होगा। तीन हस्ताक्षर होंगे मेरे तुम्हारे और ईश्वर के *ये मैं आज हूं। तुम बताओ .. कैसे हो?

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह