कल्पनापूरा संग्रह

रचना 243 / 789

उदासियाँ लिखने के लिए एक मुंशी रख लिया है

*उदासियाँ लिखने के लिए एक मुंशी रख लिया है.... प्यार से मैं उसे चाँद बुलाती हूँ *रात रखने के लिए सकोरा चाहिए था.... ज्यादा इतराओ मत चाँद *दो हिस्सों में बंट कर क्या होगा? आधा आधा तो तब भी नहीं होगा। *एक रोज़ तुम मुझसे मुझसा होकर मिलना.... कितना हो मुझमें? अपना हिसाब खुद नहीं रख पाओगे। *लिफ़ाफ़े में उदासी पूरी भर ही नहीं रही थी। स्माइली से चिपका कर भेज रहीं हूँ। *जब भी ईश्वर से बात करती हूँ.... तुम्हारी ही शिकायत करती हूँ कि तुम कितना कम कम रहा करते हो मेरे लिए... ईश्वर मेरे झूठ पर बस मुस्कुराता रहता है। *मेरी उदासी का हिस्सा वो कभी नहीं बन सकता.... हाँ ....वजह हो सकता है। *चढ़ते सूरज को सलाम करना मेरी आदत नहीं.... मैं उस टूटी डोंगी की उदासी खुरचना चाहूँगी । उस पर जुगनू के पर्याय वाची काढ़ना चाहूँगी। *मेरे लिए लिखना यानि छूना ही है। *मैं इश्क़ में हूँ... किस से? इस जवाब से हर कोई रूठ जाएगा। जाने देते हैं.... एक रोज़ मैंने ईश्वर से कान में कहा । अब रोज़ कहती हूँ।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह