कल्पनापूरा संग्रह

रचना 245 / 789

आदमी इस लिए भी बीमार है

आदमी इस लिए भी बीमार है कि खुद, खुद से एक दीवार है। हाँ - ना का खेल है ही नहीं अब शतरंज जैसा इश्क़ एक हार है सूखे पत्ते पर ओस को टिकाना थामना भी तो मेरा एक प्यार है ज़िन्दगी पत्थरों से टिकी रहती रिसना तो सबका एक गुबार है फ़िज़ूल उदासी के मौसम न बुन पतझड़ तो प्रेम की एक बहार है दिन छोटे ,रातें उससे भी छोटी औरत बिन बोझ एक कहार है *उड़ते ख़्याल ...सुबह फूलों से बातें

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह