कल्पनापूरा संग्रह

रचना 257 / 789

क्या किया जा सकता है

क्या किया जा सकता है ? पहले शोर लौटता रहा ... फिर याद लौटती रही .... फिर नाम लौटता रहा तुम्हारा अब एक अक्षर बचा है मुझमें। ये रोज़ ,अक्सर ,जब कभी ,हर पल वाला दुख कौन नदी सोखती है ? कौन पहाड़ पी जाता है यह अप्रेम? ये विवशता कौन से रंग की होती है और किस पतझर में खिलती है। *स्कूल से लौटते हुए तुम दिखे।ले आई

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह