कल्पनापूरा संग्रह

रचना 270 / 789

मेरे मन की आखरी जद पर ठहरा हुआ सफ़ीना हो तुम

मेरे मन की आखरी जद पर ठहरा हुआ सफ़ीना हो तुम ज़िद्द तुम्हारी नहीं करूंगी ... तो क्या ही करूंगी ।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह