कल्पनापूरा संग्रह

रचना 287 / 789

आग और पानी का बैर है हमारा

आग और पानी का बैर है हमारा तुम मेरे बिना झुलस नहीं सकते मैं तुम्हारे बिना भीग नहीं सकती। लाग क्या होती है प्रेम? *चांदी का सिक्का है चांद हथेली खुली हो या बंद मेरे हिस्से का मुझे मिलेगा एक रोज़। ईश्वर अभी मेरे कानों में बुदबुदा कर गया है। *चांद छूने का मन था हथेली बढ़ा दी। तुम भी जी भर आए। क्या खूब आए। शरद पूर्णिमा मुबारक ...तुम्हें ग्रहण का क्या है लगा है। लगा रहे।

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