कल्पनापूरा संग्रह

रचना 295 / 789

प्रेम के जिस रूप को इन आँखों ने देखा ......वही जीने की चाहन…

प्रेम के जिस रूप को इन आँखों ने देखा ......वही जीने की चाहना है। एक ही पंख हो उड़ने छुपने छुपाने आने जाने के लिए खुद में ... पर उस पंख पर तुम्हारा नाम गुदा हो

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