कल्पनापूरा संग्रह

रचना 297 / 789

आप कितना भी चमकते रहिए

आप कितना भी चमकते रहिए खुद को चमकाते रहिए..... धूप में जो आपका हिस्सा एक परछाई है घुप्प ...स्याह... छिटका हुआ ...फर्श पर मुसलसल हम सब वही है। वहीं हैं। भव्या और मैं .... कहीं किसी रोज़ कभी यूं भी तो हो mode में।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह