कल्पनापूरा संग्रह

रचना 302 / 789

चाँद

चाँद ... *इतरा लो..... आज तुम्हारा "दिन" है चाँद *चाँद भी अलग अलग क़िस्म के होते हैं..... मेरा वाला थोड़ा खड़ूस है। *ऐसे थम के न देखो चाँद .... मैं वही रोज़ वाली कल्पना हूँ । *आज कितना भी तुम्हें छलनी से बाँध दूँ चाँद.... कल फिर तुम सबकी छत पर ही लटके नज़र आओगे। ये दिखते दिखते गुल होने वालों को चाँद ही कहते हैं ना? सुनो... मेरे वाले का भी यही हाल है। मेरी न पूछो... *मुझे तो थाली, चम्मच ,कटोरी, कड़ाही, चकला ,तवा यहां तक कि आटे की लोई में भी चाँद नज़र आता है। रसोई में मेरा इश्क़ गुपचुप चलता रहता है। करवाचौथ पर लिखी थी *व्रत रखा नहीं पर चाँद को खूब छेड़ा 😊😊😊

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह