कल्पनापूरा संग्रह

रचना 301 / 789

इसको देखती हूं तो लगता है क्या है जो इसे खूबसूरत रखता है

इसको देखती हूं तो लगता है क्या है जो इसे खूबसूरत रखता है .... सोचा पूछ कर देखती हूं... मैंने कहा इतनी प्रेमिल कैसी रहती हो? जबकि उसकी उंगलियों पर नाचती हो। वो मुस्कुराई और बोली उसकी उंगलियां न हो तो मेरा क्या मोल? एक किनारे पर इसी तरह से पड़ी रहूंगी ।दुनिया तो मेरा नाचना देखती है... मैं उसकी छुअन सिरजती हूं। उसके बिना मेरी निरर्थकता कोई नहीं देखता। तुम इस एकतरफा प्रेम से थकती नहीं हो? मैंने पूछा मेरी थकान तो दोहरी है एक मिलन की एक बिछड़न की । इसे कह नहीं सकती । जितनी देर सार्थक होती हूं अपनी निरर्थकता मिटाती हूं ।जितनी देर निरर्थक पड़ी रहती हूं तो सार्थकता की प्रार्थना करती हूं। यानि प्रेम की यात्रा पर हो? खोज लोगी उसे? मैंने पूछा ये जो कुछ देर पहले मुझे प्रेमिल कह कर पुकारा था तुमने वो खूबसूरती उसकी घिसी उंगलियों की ही हैं। मैं बस उनको पहचानती हूं। मेरा दुःख ये है कि दुनिया मुझे नाचते हुए देख दुखती और पड़ा हुए देख चुप रहती है। सच पूछो तो मेरी ऊष्मा उसकी उंगलियों में है ।मैं काठ हूं हरारत के बिना। इसमें क्या शर्म कि उसके इशारे मुझमें प्राण भरते हैं । मैं झूम जाती हूं हर बार। छूटी हुई कोने में पड़ी रहने से तो बेहतर है रास करना। आस करना। रुकना ह्रास है ।झुकना थोड़े त्रास है। तुमने प्रेम किया है कभी कल्पना? करना खूब करना। बिना रुके। उसकी बातों से प्रेम झर रहा था और मेरी आंखों से मोती। मैंने खुद को छूकर देखा। मैं काठ थी । वापस कमरे में आकर अपनी पसंदीदा किताब निकाली। उसमें रखा मोरपंख चूमा और कहा शुक्रिया मुझमें प्रेमिल रहने के लिए। अचानक लगा कोई कह रहा हो मेरी उंगलियां तुम्हारे इंतजार में हैं ।अपनी चुप्पी, थकान, उफान,उड़ान सब लेकर बस आ जाओ। अब घर में दो कठपुतलियां हैं। दोनों मुस्कुरा रहीं।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह