कल्पनापूरा संग्रह

रचना 339 / 789

कुछ तीर तरकश में ही छूट जाते हैं

कुछ तीर तरकश में ही छूट जाते हैं मैं उसे उदासी भी कह सकती थी पर मैंने कहा *प्रेम* तुम्हारा प्रेम । दो अनुरागी दुखते हैं बहुत।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह