कल्पनापूरा संग्रह

रचना 342 / 789

दो ही पत्थर बड़े थे

दो ही पत्थर बड़े थे मन और जुबां पर रख लिए नदी बहती रही ।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह