कल्पनापूरा संग्रह

रचना 345 / 789

मेरा प्रेम घाव है ।

मेरा प्रेम घाव है । लगेगा पर कभी भरेगा नहीं एक रोज़ उसने कहा । हमेशा से चाहती थी एक दुःख बस इसलिए तुमको चुना मैंने उसे अपलक देखते हुए कहा। *प्रेम की रीत पुरानी है खाली देखा उसे भर डाला।

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