पहाड़ पर उग आने वाली रातें
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पहाड़ पर उग आने वाली रातें धुन-ध्वनियां कम ही पहनती हैं इसलिए बहुत अंतरमुखी हैं पर लिखती है डांसि पत्थर से हर पुराने चीड़ पर अपनी प्रेम कविताएँ हर बार नया प्रेम ......नया प्रेमी लिखती हैं बांवरे जंगलों के लिए अपनी लहक पर उससे भी ज्यादा अपनी गमक घुप्प सी दबे पांव काला घूंघट ओढ़े साफ साफ अलग अलग पन्नों पर कई प्रेम एक साथ जीती हुई हर लम्स हर पहर हर मीठी उमस को रखती हुई यही एक बचा आला हो जैसे। इन पहाड़ी रातों को फोड़ोगे तो कई सोते रेत के धोरे कई सौ जागे समंदर गलबहियां डाले मिलेंगे अपने पूर्ण शाश्वत रूप में और सिर्फ़ तीन शब्दों की हूक ओ रे पिया ओ रे पिया करता हुआ सांय सांय जंगल रातें अंतरमुखी हैं कहा था ना कविता पूरी हुई। धुन ध्वनियाँ दिखीं होंगी तो समझो एक पहाड़ी रात जी आये आप।
मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह