कल्पनापूरा संग्रह

रचना 347 / 789

देह, आँसू और हँसी

देह, आंसू और हंसी प्रेम के ये तीन संबल न इससे ज्यादा दिया जा सकेगा तुमसे ना ही पा सकोगे तुम। *तुम हंसी रख लो मैं आंसू रख लेती हूं। दो देहों ने एक दूजे से कहा।