कल्पनापूरा संग्रह

रचना 361 / 789

लिखती तो हूँ तुमको

लिखती तो हूँ तुमको.... पर वो उभर कर नहीं आता कागज़ पर जो पी जाती हूँ रोज़। रोज़ कागज़ पर कच्ची मिट्टी के सकोरे गढ़ती हूं बनते ही पानी भर देती हूँ बह जाती है कविता नम रह जाती हूँ मैं गीली मिट्टी से तुम तुम से सनी बस रह जाती हूँ मैं।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह