सिंहासन किसी का भी हो जाए ... हम अपने मसीहा खुद ही हैं।
सिंहासन किसी का भी हो जाए ... हम अपने मसीहा खुद ही हैं। दो दिन चुनाव की बोझिल पर मजेदार ड्यूटी के बाद आज थकान बहुत है पर एक शानदार अनुभव रहा। मुझे टीम शानदार मिली। PO 1 के रूप में ड्यूटी थी पर इतना कुछ सीख आई कि अगली बार PRO का काम भी कर पाऊंगी। चार दिन पहले मेरी टीम के लोगों को मैं नहीं जानती थी । ड्यूटी के समय कैसे चार अजनबी एक साथ हिम्मत बन जाते हैं सीखने को मिला। ईश्वर है मेरे साथ इसका सबसे अच्छा सबूत ये था कि मुझे मेरे ही तरह के लोग मिल गए। सबका काम सबने कर दिया तो 8 बजे हम मशीन सील कर तैयार थे।तगड़ी प्लानिंग और डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ वर्क तगड़ा हो तो पहाड़ भी चुटकी में हिलता है। कल का दिन पहाड़ से कम न था। एक रात पहले टीम ने मुझे घर जाने दिया तो मैं चुनाव के दिन के लिए सबका खाना बनाकर ले गई थी। थके पर हंसते रहे तो दिन आसानी से निकल गया। चुनाव तो एक जिम्मेदारी मिली थी पर जो सबसे शानदार बात मेरी टीम की रही कि renumeration में सबको काम के हिसाब से पैसे मिलने थे तो मेरे हिस्से कम आए क्योंकि मैं घर चली गई थी रात पर मेरे साथ के सभी पुरुष साथी जो मेरे से उम्र में कम ही थे बोले नहीं maam ये तो team work था। सारा रिन्यूमेरेशन साथ मिला कर चार हिस्से कर दिए और PRO ने 1900 रुपए दिए। मैं सोच में पड़ गई जहां लोग एक रुपया नहीं छोड़ते आज भी ऐसे मनुष्य हैं जो दूसरों का मन ही नहीं मान भी रखते हैं। मन सुकून से भर गया। पैसे की बात नहीं दूसरे को अपना हिस्सा देने की बात थी। जिनसे कभी न मिले हों और आगे भी शायद ही मिलना हो पर एक मीठी याद छप गई मुझमें। वही lazy कल्पना के चेहरे पर दिख रही। दूसरी तस्वीर मनुष्यता की गवाह है। ईश्वर ऐसे ही लोगों में बसता है। बस दिखता कम लोगों को है। आबाद रहिए आप तीनों... Dabas sir, Abhishek Parcha और Sangam