कल्पनापूरा संग्रह

रचना 363 / 789

जितनी बार टूटते हैं उतनी बार रफू हो जाते हैं

जितनी बार टूटते हैं उतनी बार रफू हो जाते हैं ... दिल बना रहता है । तुम मर्ज थे ही नहीं कभी ज़िद्द थे है और रहोगे।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह