कल्पनापूरा संग्रह

रचना 374 / 789

एक पंखुड़ी का फूल...प्रेम

एक पंखुड़ी का फूल...प्रेम ये फूल इसलिए सुंदर है कि बहुत सारी पंखुड़ियों से बना है।जैसे तुम .... लड़की ने लड़के की तरफ फूल बढ़ाते हुए कहा जैसे मैं.....? मुझमें क्या बहुत सारा है ? लड़के ने हैरत में पूछा। हर पंखुड़ी एक प्रेमिका है तुम्हारी ।तुम उन सभी के प्रेम के कारण खूबसूरत हो। सबका नेह तुमको प्रेमिल रखता है। लड़की ने दूसरी ओर देखते हुए कहा ओहहो..... सच ...इत्ती सारी। तो कोई प्रेम में न पड़े मेरे ।लड़के ने लड़की को चिढ़ाते हुए पूछा पड़ा रहे.... लड़की ने खिलखिलाकर कहा। अच्छा तुम कहो तुम क्या नहीं हो इन पंखुड़ियों में और अगर हो तो मैं कैसे पहचानूँ? लड़के ने फिर फूल लड़की की तरफ बढ़ाते हुए पूछा। हूँ तो....पर अभी मैं तुम्हें नहीं बताऊंगी।ये फूल रख लो ।जो पंखुड़ी बरसों बाद तक इसमें आखिर तक रुकी मिलेगी वही मान लेना कि मैं हूँ। लड़की ने मुतमईन मुस्कान बिखेर दी। तो तुम बरसों बाद तक रुकोगी ? फूल जीता रहे प्रेम?लड़के ने प्रश्न में वादा माँगा मेरा फूल रोके रखेगा तो बेशक रुकूँगी ।लड़की ने हथेली पर फूल रख कर एक तस्वीर ली और तारीख क़ैद कर ली। तब तक पंखुड़ी को प्रेमिका ही कहता रहूँ क्या? लड़के ने चुपके से फूल की एक पंखुड़ी बचा कर बाक़ी सब लड़की के ऊपर बरसा दी। नहीं रे .....कल्पना कहा करो। लड़की ने कहा *कल्पना सुनते ही आँख खुल गयी।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह