कल्पनापूरा संग्रह

रचना 375 / 789

जाने कितनी बार सूखे

जाने कितनी बार सूखे फिर हरे हो गए जो दरख़्त अबकी इश्क़ हो गए। तुम्हारी भेजी "हाँ" मिली .... मेरी पहुंची क्या ? 😊😊😊😊

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह