कल्पनापूरा संग्रह

रचना 385 / 789

साल भर पहले एक कहानी लिखी थी

साल भर पहले एक कहानी लिखी थी... पहली कहानी .... पहला प्रयास सोलमेट वो अकेली कभी नहीं थी पर अब लोगों पर विश्वास करने की भूल नहीं करती थी।शादी के बीस सालों में उसने जिंदगी के इतने झूठ देख सुन लिए थे कि वो रिएक्ट करना भूल गई थी। रिश्तों को वक्त देते रहो तो पकते हैं पर नैना शिरीष का रिश्ता बीते सालों में गल गया था। जिस रिश्ते की नींव में मट्ठा पड़ा हो वो क्या ही गुलाब खिलाएगी। शादी के ठीक एक महीने बाद नैना को पता चल गया कि घर गृहस्थी चलाना शिरीष के बस का नहीं ।वो जान चुकी थी कि उसे अकेले एक लंबी लड़ाई लड़नी है ।ईशान और इरा के अलावा उसकी ज़िंदगी में कोई रोशनी नहीं दिखती थी। गठबंधन अब बस बंधन रह गया था। ईश्वर जब राह तंग करता है तो तक़दीर पर भी कीड़े पड़ जाते हैं।शिरीष बेरोज़गार तो था ही पर narcissist भी बन गया ।वो बात बात पर नैना को मैनिपुलेट करता रहता ।नैना के सेल्फ कॉन्फिडेंस में उसने सुराख कर दिए थे।।बच्चों से तो शिरीष को रत्ती भर मोह कभी नहीं हुआ।हंसमुख नैना डिप्रेशन का शिकार हो गई। उस ने खुद को दोनों बच्चों की जरूरतों में पीस दिया।वो बस बच्चों के लिए जी रही थी। उस रोज़ किताब में डूबी नैना अपनी दोपहर को बस यूं ही फिजूल कर रही थी। अचानक उसके फोन पर मैसेज चमका... “नैना ... कैसी हो? मैं लौट आया हूं।१२ दिसंबर अबकि कई सालों बाद आएगा।आओगी न मिलने “? 12 दिसंबर ... इस तारीख के साथ नैना और Dr कार्तिक आनंद का बरसों का नाता था। Dr. Anand नैना के क्या थे ये वो भी नहीं जानती थी पर वो उसको सोलमेट कह कर बुलाते थे। नैना अतीत के पन्नों को पलटने लगी तो उसे याद आया कि कल ही तो १२दिसंबर है। कायदे से उसे इतने बरस बाद याद करने वाले किसी भी शख्स के मैसेज को इग्नोर कर देना चाहिए था। पर Dr.Anand को मना करना उसके बूते के बाहर था। स्त्री जिसके सामने आत्म रख देती है उसे फिर कभी नहीं नकार सकती।सुबह सुबह नैना बच्चों को स्कूल छोड़ ऑफिस से आधे दिन की छुट्टी लेकर Dr. Anand के घर पहुंच गई। वह डायरी में कुछ लिख रहे थे। वो पूरी दुनिया के लिए Dr. Anand थे पर नैना के लिए इस समय वो कार्तिक था। “जितनी दूर तक लिखते जाओगे....दर्द उतनी देर तक पढ़ा जाएगा। लाओ..... संभाल कर रख दूँ…” ये पढ़ते हुए नैना ने कार्तिक की ऐनक उतारी और उसकी डायरी परे रखनी चाही । “जब से आई हूँ तुम्हारे कमरे की उदासियाँ ही समेट रही। कौन इस तरह राख के बदले कागज़ की कतरनों से ऐशट्रे भरता है? नैना बोले जा रही थी। नैना बस पलटने ही वाली थी कि लगा कार्तिक ने उसकी बांह मरोड़ कर उसके कांधे पर सर रख दिया है। ”तुम क्यों चली आती हो मेरी उथल पुथल में ?तुम क्यूँ हिसाब लेती हो मेरी उदासियों का ? क्यों चुभती हो मुझे ? “ “कार्तिक मेरी चूड़ियां । मुझे दर्द हो रहा ,प्लीज” नैना कुछ धीमे आवाज़ में बोली। “ दर्द तो मुझे भी होता है पर तुमको दिखता कहाँ है?”....कार्तिक ने थोडा हंसते थोड़ा तल्ख़ होकर नैना को परे धकेल दिया। “अतीत ...तीन अक्षरों से भले ही बनता हो पर चोट गहरी करता है”। नैना ऐसा कहकर खिड़की के बाहर बादलों को देखने लगी।नैना के सामने बीते कई साल उभर आए। “शिरीष कैसा है”? कार्तिक ने पूछा "पेड़ पर उस चिड़िया को देख रहे हो ...कार्तिक । उसका एक मदारी है। शिरीष वही मदारी है।नैना की आवाज़ में उदासी झलक रही थी। "आओ यहां इस झूले पर बैठो’’ .... कार्तिक झूला धकेलते हुए बोला “नैना तुम्हें अपनी तरफ आता हुआ और जा कर लौटते हुए देखना कितना खूबसूरत है ”। “तुम आ क्यूं नहीं जाती ? सब हमेशा से तुम्हारा है”....कार्तिक बोलता रहा। झूले को रोक कर बेहद पास आकर नैना बोली…”खुद से सच्चा होने के लिए हमें बहुत सारे झूठ पार करने पड़ते हैं।मुझे तैरना आता है .... तर ना नहीं। मैं बस अब अपने बच्चों के लिए ही बची रह गई हूं”। झूला अब पूरी तरह रुक गया ।कार्तिक नैना की ऐसी ना हर बार सुनता था। वो कायम रहती हर बार।वो टूट जाता हर बार... “तुम कब तक ऐसे टॉक्सिक रिलेशन को ढोती रहोगी नैना? इस बार मैं तुमसे आखरी बार पूछ रहा हूं। वहां लंदन में मां अब भी तुम्हारे आने का इंतजार कर रही। इस बार ये घर बेचने ही आया हूं। शायद अब वहां से आना न हो I कार्तिक की बातों में ढेर सारी तल्खियां उभर आई। कार्तिक को अपने लिए ऐसा परेशान देख कर नैना के आंसू छलक पड़े। उसने पर्स से इरा ईशान की तस्वीर निकाली और बोली “कार्तिक इनके सामने खुद को क्या देखूं? ईशान इरा के बड़े बड़े सपने हैं। इनके लिए कौन सोचेगा ?मैं हर मामले में कमज़ोर पड़ सकती हूं पर अपने बच्चों को लेकर कॉम्प्रोमाइज नहीं करूंगी।” “नैना बच्चे बड़े हो गए हैं। सब समझते हैं। ईशान और इरा कभी नहीं चाहेंगे कि उनकी मां चाबी भरे खिलोने सी जिंदगी गुजार दे।” कार्तिक नैना को समझाए जा रहा था। “नहीं कार्तिक ऐसा नहीं है।तुम से कह पाती हूं दुख इस लिए कह देती हूं। मुझे अब ममता के अलावा कोई रिश्ता समझ नहीं आता ।इतने सालों से तुम से दोस्ती है । वही रहे तो अच्छा हो ।बोझ न बनाओ मुझे।” नैना रोए जा रही थी। तभी नैना के फोन पर शिरीष का मैसेज फ्लैश हुआ... “कहां घूम रही हो महारानी? किसके साथ हो?” नैना घबरा गई। बिना कुछ कहे कार्तिक के गले लगी और जल्दबाजी में वहां से निकल गई।कार्तिक कुछ कह पाता इससे पहले वो टैक्सी में बैठ कर चली गई। १२ दिसंबर फिर खाली रह गया। अब भी ऐसी कई बातें कार्तिक के मन में ही रह गयी जो वो नैना से कह देना चाहता था।मायूस कार्तिक अगली रोज़ फ्लाइट पकड़कर लंदन चला गया। फ्लाइट बोर्ड करने से पहले उसने एक फैमिली ग्रुप together we can की चैट नैना से share की । पांच बरस से ईशान,इरा और कार्तिक की एक अलग ही दुनिया पनप रही थी जहां कार्तिक उनका दोस्त ही नहीं मेंटर भी था। ईशान को Monash University की scholarship ग्रांट हो गई थी । इरा को भी लंदन में फैशन डिजाइनिंग की इंटरशिप का ऑफर आ चुका था। साथ में थे उन दोनों के वीज़ा और air टिकट्स की कापी। नैना ग्लानि में बुत बन गयी।। कार्तिक की वो soulmate थी पर वो उसके बच्चों का पिता कब बन गया ये सोच सोच कर वो रोए जा रही थी। उसकी आंखों के सामने हर साल का १२ दिसंबर हिसाब लेकर खड़ा हो गया। ये कैसा अनकंडीशनल रिश्ता था कार्तिक का ? कार्तिक का फोन स्विच ऑफ आ रहा था। नैना को लगा काश वो कार्तिक को गले लगकर शुक्रिया कह पाती।।काश उसके संग कुछ देर और ठहर पाती । शाम को घर लौटी तो उसकी गोरी पीठ पर दाहिने काँधे के पास एक अक्षर ‘K’ गुदा दिखाई दिया जो एक मोरपंखी बाँसुरी पर टिका था। बाँसुरी पर रेशम की दो डोरियाँ गुदी हुई थी जिन पर ‘I’ लिखा था । देह पर ऐसा शुक्रिया लिखकर दूर से ही सही, नैना ने खुद को हमेशा के लिए कार्तिक का कर दिया। कार्तिक फिर कभी ना लौटा न नैना कभी उसके पास पहुंच पाई पर दोनों ने एक दूसरे को अपने अपने अंतस में जगह दे दी । अब फ़ैमिली ग्रूप में नैना भी जुड़ गयी है। फ़ोन आने पर अब स्क्रीन पर कार्तिक का नाम सोल्मेट फ़्लैश होता है। कल्पना पांडे

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह