कल्पनापूरा संग्रह

रचना 414 / 789

मैं उससे बंधी हूँ ... पर वो मुझसे मुक्त है।

मैं उससे बंधी हूँ ... पर वो मुझसे मुक्त है। कुछ कीलें चुभती नहीं पर टेक जरूर देती हैं। निर्मोही ! तुम्हारे शब्दों का इंतज़ार रहेगा। प्रेम तुम्हारे हिस्से में भी कम ही रहे। खर्च न हो मेरे बाद कभी।

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