कल्पनापूरा संग्रह

रचना 509 / 789

माना कि हम यार नहीं

माना कि हम यार नहीं... अक्सर एक ख़्वाब देख कर जग जाती हूँ । मैं रेत पर तुम्हारा नाम लिख रही हूँ.... तुम मुस्कुराते देख रहे हो। तुम उसे मिटा कर कोई अलग नाम लिख देते हो। बहुत कोशिश करती हूँ कि तुम्हारा लिखा नाम पढ़ सकूं पर साफ साफ देख नहीं पाती । तुम पीठ करके खड़े जो रहते हो मेरी तरफ़ हँस कर मुड़ते हो तो तुम्हारी आँखों में दो अक्षर का नाम दिखता है । मैं रेत में धंसने लगती हूँ। कुछ खुरचने लगती हूँ। ये सोच कर आँख खुल जाती है कि मेरा नाम तो चार मनकों का है । देखती हूँ... तुम्हारी उंगलियों में दो ही अक्षर वाली रेत चिपकी है। मैं वहीं कहीं एक छोटी सी लहर के साथ बह जाती हूँ । तुम मुझे जाते जाते देख रहे हो। मैं भी जाते हुए तुम्हारी नाम के मनके बहा रही हूँ .... तुम्हारे लिखे दो अक्षरों की तरफ देर तक। जिस तरफ मैं बह रही वहां शोर है । तुम बैठे हुए हो अब तक .... उल्टी दिशा से तकते हुए मुझे। मुस्कान कायम है तुम्हारी। बहुत दूर से देखने पर दो अक्षर का चेहरा साफ साफ दिखने लगता है। तुम्हारे कांधे पर सर रखे मुस्कुराता हुआ। तुम अब भी मुझे देख मुस्कुरा ही रहे हो। एक धुंआ सांझा होते देख रही हूँ .... एक धुंध गुम होते देख रही हूँ। ये ख़्वाब टूट जाता है ... और मैं भी घबराकर जब जगती हूँ तो खुद से कहती हूँ उसकी चुप्पी ही सही है कल्पना। कम से कम ना तो नहीं कहती।😊 एक रोज़ सच कहना। मनके दो हैं या चार?

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह