सही सही इश्क़ लिखा ही नहीं जा सकता l कभी मात्रा रह जाती है कभी विराम l
रचना 510 / 7897 दिसंबर 2024सही सही इश्क़ लिखा ही नहीं जा सकता l✣सही सही इश्क़ लिखा ही नहीं जा सकता l कभी मात्रा रह जाती है कभी विराम lमूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह