विदा देह की नहीं मन की होनी चाहिए। जब तक मन न चाहे तुम जा ह…
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विदा देह की नहीं मन की होनी चाहिए। जब तक मन न चाहे तुम जा ही नहीं सकोगे मुझ से दूर ।मैं भी आती रहूंगी जब तक तुम्हारा मन मुझे आवाज़ देगा। उस रोज़ हमारा मिलना और विदा हो जाना बस एक पल था जो तरंगों में बदल गया और इस ब्रह्मांड में घुल गया। दो मन देह से निकल कर अलग अलग दिशाओं में छिटक गए। दूर ...बहुत दूर वो मन तारे हो गए शायद। मिलने बिछड़ने से परे एक दुनिया चुन ली। दूर से देख की दुनिया पास में चुप रहने की दुनिया अब चुप्पी सुलभ प्रेम है । अलभ्य अब कुछ भी तो नहीं। तुम भी नहीं।
मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह