कल्पनापूरा संग्रह

रचना 518 / 789

ज़िन्दगी को यूं खिसकते हुए देखती हूँ

ज़िन्दगी को यूं खिसकते हुए देखती हूँ तो लगता है अच्छा हुआ उस रोज़ मैंने पहाड़ को प्रेमी चुना सब के पास होना चाहिए पहाड़ सा एक मौन पत्थर।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह