कल्पनापूरा संग्रह

रचना 519 / 789

लिखने से कहीं ज़्यादा मैंने मिटा दिया।

लिखने से कहीं ज़्यादा मैंने मिटा दिया। अक्सर हम जो जीते हैं वो लिख लेते हैं और जो बिना लिखे मिटा देते हैं बस वही जीना चाहते हैं। हमेशा कहती हूं ऐसा कुछ नहीं लिखती जो लिखा न गया हो पर वो यह कहकर मेरा कहा मिटा देता है कि जो तुमने जिया वो कौन जी सकता है तुम्हारे सिवा। जो नहीं लिखती वही तुम्हारा है, जो मिटा देती हूं वही तुम्हारे लिए । मिला क्या प्रेम? फ़िर ये लिखा हुआ क्या है कल्पना ? ये मिटाया हुआ मेरा जिया हुआ है अप्रेम।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह