कल्पनापूरा संग्रह

रचना 547 / 789

अनकहा लिख कर आकाश में उछाल देती हूं

अनकहा लिख कर आकाश में उछाल देती हूं.... चांद लपक लेता है । खत जो कहीं नहीं पहुंचते पर भीगता है कोई कहीं किसी चाहना में।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह