कल्पनापूरा संग्रह

रचना 556 / 789

एक रोज़ रूह से अर्जी लगाऊंगी ।

एक रोज़ रूह से अर्जी लगाऊंगी । आना तुम।

मूल प्रकाशनKalpana Pandey का Facebook संग्रह